स्मार्टफोन में बिना मोबाइल टावर के नेटवर्क मिलेगा:ट्राई ने सैटेलाइट D2D सर्विस को मंजूरी दी; 20 साल के लिए लाइसेंस मिलेगा
अब पहाड़ों, जंगलों या दूर-दराज के इलाकों में मोबाइल टावर न होने पर भी आपके फोन में नेटवर्क गायब नहीं होगा।

JHVP BHARAT NEWS
Delhi: News Desk
EDITED BY: PARWEZ ALAM
स्मार्टफोन में बिना मोबाइल टावर के नेटवर्क मिलेगा:ट्राई ने सैटेलाइट D2D सर्विस को मंजूरी दी; 20 साल के लिए लाइसेंस मिलेगा
ट्राई ने सैटेलाइट D2D सर्विस को मंजूरी दी; 20 साल के लिए लाइसेंस मिलेगा|
अब पहाड़ों, जंगलों या दूर-दराज के इलाकों में मोबाइल टावर न होने पर भी आपके फोन में नेटवर्क गायब नहीं होगा।
भारत की टेलीकॉम संस्था ‘ट्राई’ (TRAI) ने ऐसे नए नियम बनाने की सिफारिश की है, जिससे आपका स्मार्टफोन सीधे अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट से जुड़ सकेगा।
इस नई व्यवस्था में टेलीकॉम कंपनियों जैसे जियो या एयरटेल को खुद का महंगा सैटेलाइट सिस्टम लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
वे सैटेलाइट बनाने वाली कंपनियों का नेटवर्क किराए पर लेकर ग्राहकों तक सेवा पहुंचा सकेंगी। इसके लिए कंपनियों को पूरे देश में 20 साल तक काम करने का लाइसेंस दिया जाएगा।
स्मार्टफोन सीधे अंतरिक्ष से जुड़ेंगे
इस नई योजना की सबसे खास बात ‘डायरेक्ट-टू-डिवाइस’ (D2D) तकनीक है। TRAI ने इसके लिए स्पेक्ट्रम के इस्तेमाल की सिफारिश की है, जिससे आपका साधारण स्मार्टफोन बिना किसी अतिरिक्त डिवाइस के सीधे अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट से जुड़ जाएगा।
इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि पहाड़, घने जंगल, समुद्र के बीच या किसी आपदा जैसे बाढ़ या तूफान के समय जब जमीन वाले मोबाइल टावर काम करना बंद कर देते हैं, तब भी आपके फोन में कॉल और इंटरनेट चलता रहेगा।
कंपनियों को नहीं बनाना पड़ेगा महंगा इंफ्रास्ट्रक्चर
फिलहाल एलन मस्क की कंपनी ‘स्टारलिंक’, एयरटेल की पार्टनर कंपनी ‘यूटेलसैट वनवेब’ और रिलायंस जियो भारत में सैटेलाइट इंटरनेट लाने की होड़ में हैं।
ट्राई के इस नए नियम से जियो, एयरटेल और वोडाफोन-आइडिया (Vi) जैसी मोबाइल कंपनियों का बड़ा खर्च बच जाएगा।
उन्हें अब खुद के महंगे सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजने की जरूरत नहीं होगी। वे सैटेलाइट बनाने वाली कंपनियों के साथ आसानी से पार्टनरशिप कर सकेंगी और उनके नेटवर्क को किराए पर लेकर सीधे अपने ग्राहकों को सैटेलाइट सेवा दे सकेंगी।
लाइसेंस फीस और स्पेक्ट्रम आवंटन की शर्तें
TRAI ने कंपनियों के लिए कमाई और स्पेक्ट्रम के खर्च से जुड़े नियम भी तय कर दिए हैं…
8% लाइसेंस फीस: कंपनियों को अपनी कुल कमाई का 8% हिस्सा लाइसेंस फीस के रूप में सरकार को देना होगा। इसमें कोई फिक्स्ड न्यूनतम फीस नहीं रखी गई है।
स्पेक्ट्रम का सालाना चार्ज: सरकार जो स्पेक्ट्रम (रेडियो तरंगें) आवंटित करेगी, उसके लिए कंपनियों को कम से कम ₹3,500 प्रति मेगाहर्ट्ज (MHz) के हिसाब से सालाना चार्ज देना पड़ेगा।
5 से 7 साल का आवंटन: स्पेक्ट्रम का आवंटन शुरुआत में 5 साल के लिए सीधे किया जाएगा, जिसे बाजार के हालात देखकर आगे 2 साल के लिए और बढ़ाया जा सकेगा।
विशेष: भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (TRAI) भारत में दूरसंचार और प्रसारण क्षेत्रों का एक स्वतंत्र नियामक निकाय है। इसकी स्थापना भारत सरकार द्वारा 20 फरवरी 1997 को संसद के एक अधिनियम (TRAI अधिनियम, 1997) के तहत की गई थी।
प्रमुख विवरण और कार्य:
• मुख्यालय: नई दिल्ली (महानगर दूरसंचार भवन)
• अध्यक्ष: अनिल कुमार लाहोटी
• मुख्य उद्देश्य: भारत में दूरसंचार सेवाओं के विकास के लिए पारदर्शी, निष्पक्ष और प्रतिस्पर्धी माहौल तैयार करना।
• प्रमुख कार्य:
• दूरसंचार सेवाओं के लिए टैरिफ (दरें) और शुल्क निर्धारित करना।
• उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना और सेवा की गुणवत्ता (Quality of Service – QoS) के मानक तय करना।
• स्पेक्ट्रम के कुशल उपयोग को बढ़ावा देना।
• दूरसंचार क्षेत्र से जुड़े नीतिगत मामलों पर केंद्र सरकार को सिफारिशें भेजना।





